काशी की आवाज, सड़कों पर आतंक नहीं, सुरक्षा और समाधान की जरूरत…
Voice of Kashi, no terror on the streets, need security and solutions

Breaking Today, Digital Desk : वाराणसी की गलियों और सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते, जो कभी अपनी वफादारी और समझदारी के लिए जाने जाते थे, आज शहरवासियों के लिए चिंता का एक बड़ा कारण बन गए हैं। कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं ने लोगों के दिलों में एक डर पैदा कर दिया है, जिससे कोई भी सड़क, गली या मोहल्ला सुरक्षित महसूस नहीं होता। इस गंभीर होती समस्या का समाधान अब केवल नगर निगम या पशु प्रेमियों की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
महादेव की नगरी काशी में, जहां हर जीव के प्रति दया और करुणा का भाव रखा जाता है, वहां कुत्तों का आक्रामक व्यवहार एक गंभीर विषय बन चुका है। ‘हिन्दुस्तान’ द्वारा आयोजित एक चर्चा में, शहर के नागरिकों, पशु प्रेमियों और श्वान शेल्टर होम के संचालकों ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे। इस चर्चा में शामिल सभी लोगों ने एक स्वर में यह माना कि इस समस्या का एकमात्र और सबसे कारगर समाधान आवारा कुत्तों की युद्धस्तर पर नसबंदी है।
क्यों बढ़ रहा है आक्रामक व्यवहार?
अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ये कुत्ते इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं? एनीमोटल केयर ट्रस्ट की अध्यक्ष सुदेशना बसु और राकेश पांडेय जैसे पशु प्रेमियों का कहना है कि इसके पीछे का कारण काफी हद तक हम इंसान ही हैं। सड़कों पर भटकने वाले ये बेजुबान जानवर अक्सर भूखे, प्यासे और कई तरह की बीमारियों से पीड़ित होते हैं। उनकी पीड़ा और जरूरतों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जो उनके व्यवहार में चिड़चिड़ाहट और आक्रामकता का कारण बनता है।
क्या है समाधान?
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि शहरी क्षेत्रों में नगर निगम को युद्धस्तर पर नसबंदी अभियान चलाना चाहिए। वहीं, ग्रामीण कस्बों और बाजारों में पशुपालन विभाग को भी इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल होना होगा। हर ब्लॉक में तैनात पशु चिकित्सा अधिकारियों की मदद से कम समय में अधिक से अधिक कुत्तों की नसबंदी की जा सकती है, जिससे उनकी बढ़ती आबादी पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाई जा सकेगी।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि हमारा उद्देश्य इन बेजुबान जानवरों को खत्म करना नहीं, बल्कि एक ऐसा संतुलन बनाना है जहां इंसान और जानवर दोनों सुरक्षित रूप से सह-अस्तित्व में रह सकें। इसके लिए न केवल सरकारी स्तर पर ठोस पहल की आवश्यकता है, बल्कि आम नागरिकों को भी संवेदनशील और जागरूक होने की जरूरत है। हमें यह याद रखना होगा कि करुणा और सहिष्णुता के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।






