
Breaking Today, Digital Desk : विज्ञान और चिकित्सा जगत में दशकों तक अपनी सेवाएं देने वाले भारतीय मूल के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर ने कभी नहीं सोचा था कि वे एक दिन परलोक और मृत्यु के बाद के जीवन जैसी बातों पर विश्वास करेंगे। उनके लिए, मानवीय चेतना मस्तिष्क की जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का ही एक परिणाम थी। मगर एक जानलेवा बीमारी के दौरान हुए अनुभव ने उनकी इस सोच को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया, और वे अब परलोक के अस्तित्व को एक हकीकत मानते हैं।
यह कहानी है एक ऐसे चिकित्सक की, जो विज्ञान की कसौटी पर ही हर चीज को परखते थे और अपने मरीजों द्वारा बताए गए मृत्यु के निकट के अनुभवों (Near-Death Experiences) को दिमागी भ्रम या दवाओं का असर मानकर खारिज कर देते थे। लेकिन, जब वे स्वयं मौत के दरवाजे पर पहुंचे, तो उन्होंने कुछ ऐसा अनुभव किया जिसने उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को झकझोर दिया।
एक गंभीर बीमारी के चलते वे कोमा में चले गए थे। डॉक्टरों के अनुसार, उनके मस्तिष्क का वह हिस्सा जो विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करता है, पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका था। चिकित्सकीय दृष्टि से, उस अवस्था में किसी भी प्रकार का सचेत अनुभव संभव नहीं था। फिर भी, उस गहन बेहोशी की अवस्था में, उन्होंने एक अद्भुत और अलौकिक यात्रा का अनुभव किया।
उन्होंने बताया कि कैसे वे अपने शरीर से बाहर निकलकर खुद को डॉक्टरों द्वारा इलाज करते हुए देख पा रहे थे। इसके बाद वे एक ऐसे लोक में पहुंचे जो दिव्य प्रकाश और असीम प्रेम से परिपूर्ण था। वहां उनकी भेंट कुछ ऐसी शक्तियों से हुई जिन्होंने उन्हें ब्रह्मांड के रहस्यों और जीवन के उद्देश्य के बारे में समझाया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इस अनुभव के दौरान उन्हें अपने जीवन के अच्छे और बुरे कर्मों का अवलोकन भी कराया गया।
जब वे कोमा से बाहर आए, तो यह उनके सहयोगियों और परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन उनके लिए, असली चमत्कार उनका वह दिव्य अनुभव था, जिसने जीवन और मृत्यु के प्रति उनके नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया था। उन्होंने अपने इस अनुभव को अपनी पुस्तकों और साक्षात्कारों के माध्यम से दुनिया के साथ साझा किया है। उनका कहना है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों मिलकर हमें अस्तित्व की एक गहरी समझ प्रदान कर सकते हैं।
उनकी यह कहानी आज दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और इस विषय पर एक नई बहस को जन्म देती है कि क्या हमारी चेतना शरीर के खत्म हो जाने के बाद भी बनी रहती है।






