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जन्माष्टमी को भक्तिभाव से कैसे मनाएं, प्रेमानंद महाराज के सुझाए सरल और सही तरीके…

How to celebrate Janmashtami with devotion, simple and correct methods suggested by Premanand Maharaj

Breaking Today, Digital Desk : जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का समय है, जिसे पूरे भारत में बड़े ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर भगवान की कृपा पाने और पूजा का पूरा फल प्राप्त करने के लिए उसे सही विधि-विधान से मनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वृंदावन के श्रद्धेय संत प्रेमानंद महाराज जी ने जन्माष्टमी मनाने के कुछ सरल और शास्त्रसम्मत तरीके बताए हैं, जिससे भक्त भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार, आजकल जन्माष्टमी पर केक काटने का चलन बढ़ गया है, जिसे वे वैष्णव परंपरा के अनुसार सही नहीं मानते। उनका कहना है कि बाजार में मिलने वाले केक की शुद्धता की कोई गारंटी नहीं होती और उनमें अंडे जैसी अभक्ष्य वस्तुओं का उपयोग हो सकता है। भगवान को भोग लगाने के लिए सात्विकता सर्वोपरि है। वे कहते हैं कि बाहरी दिखावे की बजाय मन की भक्ति अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आप पूरी श्रद्धा और पवित्रता से घर में बनी एक साधारण रोटी पर भी घी लगाकर भोग लगाएंगे, तो श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर उसे स्वीकार करेंगे।

भगवान की सेवा और पूजा की सही विधि

प्रेमानंद जी महाराज ने भगवान के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा की सही विधि पर भी प्रकाश डाला है:

स्नान और श्रृंगार: जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराएं और फिर साफ जल से स्नान कराकर सुंदर, स्वच्छ वस्त्र पहनाएं, विशेषकर पीले रंग के। उनका फूलों, आभूषणों और चंदन के लेप से श्रृंगार करें।

प्रिय भोग: भगवान को माखन-मिश्री, पंजीरी, चावल से बने मालपुए और अन्य पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करें।

भजन-कीर्तन: इस दिन भगवान के 108 नामों का जाप करना और कृष्ण लीला की कथाओं को सुनना बहुत शुभ होता है। घर में श्रद्धापूर्वक भजन-कीर्तन करने से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

व्रत के नियम और इसे खोलने का सही समय

जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, उन्हें कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। प्रेमानंद जी के अनुसार, व्रत वाले दिन किसी दूसरे के घर पर अन्न या जल ग्रहण करने से बचना चाहिए, नहीं तो व्रत खंडित हो सकता है। व्रत के दौरान तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन और मांसाहार का त्याग करना चाहिए। व्रत को खोलने का सही समय मध्यरात्रि में भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद है। भगवान को भोग अर्पित करने के बाद उसी प्रसाद को ग्रहण करके व्रत का पारण करना चाहिए।

यह जन्माष्टमी का व्रत 100 एकादशी व्रतों के बराबर फल देने वाला माना जाता है, जो भक्तों के जीवन से कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि लाता है। इस प्रकार, जन्माष्टमी का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान के प्रति अपने प्रेम, श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करने का एक सुंदर अवसर है।

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