
Breaking Today, Digital Desk : आजकल एक ख़बर बड़ी सुर्खियां बटोर रही है – मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर को लेकर। आपने शायद सुना होगा कि कुछ लोग उन्हें ‘गे’ बता रहे हैं, और ये दावे एक लेखक की तरफ से किए जा रहे हैं, जो उनकी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ का हवाला दे रहे हैं। ये बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है, खासकर जब हम बाबर को एक महान योद्धा और साम्राज्य निर्माता के तौर पर जानते हैं। तो चलिए, थोड़ा गहराई से समझते हैं कि आखिर ये पूरा मामला क्या है।
बाबरनामा में छिपा है ये राज़?
दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ ‘बाबरनामा’ है। ये बाबर ने खुद लिखी थी, और इसमें उन्होंने अपने जीवन, लड़ाइयों, राजनीति और यहां तक कि अपनी निजी भावनाओं का भी जिक्र किया है। लेखक का दावा है कि बाबरनामा में कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं, जो बाबर के समलैंगिक झुकाव की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने खास तौर पर एक लड़के, बाबूरी, का जिक्र किया है, जिसके प्रति बाबर की गहरी भावनाएं थीं।
कहा जाता है कि बाबर ने बाबूरी को लेकर अपनी भावनाओं को बाबरनामा में काफी खुलकर व्यक्त किया है। उन्होंने उसकी खूबसूरती, उसके प्रति अपने आकर्षण और उससे मिलने की अपनी चाहत का जिक्र किया है। ये वर्णन इतना भावुक और निजी है कि कुछ लोग इसे प्रेम की अभिव्यक्ति मान रहे हैं, जो आज के संदर्भ में समलैंगिक प्रेम की ओर संकेत कर सकता है।
लेकिन, क्या हम इसे ‘गे’ कह सकते हैं?
अब सवाल ये उठता है कि क्या बाबर की इन भावनाओं को आज के दौर के ‘गे’ होने की परिभाषा में फिट किया जा सकता है? इतिहासकार अक्सर ऐसे मामलों में बहुत सावधानी बरतते हैं। उस समय के समाज, संस्कृति और रिश्तों को आज के नजरिए से देखना हमेशा सही नहीं होता।
पुराने समय में, खासकर शाही घरानों में, प्रेम और आकर्षण की अभिव्यक्तियाँ आज से काफी अलग थीं। कभी-कभी गहरे भावनात्मक जुड़ाव को आज के यौन संबंधों की तरह नहीं देखा जाता था। यह भी हो सकता है कि बाबर ने बाबूरी की सुंदरता और व्यक्तित्व की प्रशंसा एक कलात्मक या काव्यात्मक तरीके से की हो।
ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि बाबरनामा में उनकी पत्नियों और बच्चों का भी जिक्र है, जो उनके पारंपरिक पारिवारिक जीवन को दर्शाता है। तो क्या ये सिर्फ एकतरफा आकर्षण था, या कुछ और?
फिलहाल, इस पर कोई ठोस ‘हां’ या ‘ना’ नहीं कहा जा सकता। लेखक अपने दावे बाबरनामा के कुछ अंशों के आधार पर कर रहे हैं, जो चर्चा का विषय बने हुए हैं। इतिहास के कुछ विद्वान इन दावों से इत्तेफाक रखते हैं, तो कुछ इसे उस दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक बारीकियों को समझने की कमी मानते हैं।
आखिरकार, ये बहस हमें इतिहास को एक नए नज़रिए से देखने का मौका देती है, और हमें याद दिलाती है कि इतिहास के पन्ने हमेशा सीधे और सपाट नहीं होते। उनमें कई अनसुनी कहानियाँ और गहरे राज़ छिपे हो सकते हैं, जिन्हें समझने के लिए खुले दिमाग की ज़रूरत होती है।






