
Breaking Today, Digital Desk : बिहार की सियासत में जब भी विरासत की बात आती है, तो नजरें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर टिक जाती हैं। दशकों से समाजवादी उसूलों पर अपनी राजनीति की नींव रखने वाले नीतीश ने हमेशा परिवारवाद का विरोध किया है। अब एक बार फिर उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीतिक बागडोर सौंपने की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है। नीतीश का यह फैसला उनके समाजवादी आदर्शों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दिखाता है, जहाँ परिवार नहीं, बल्कि विचारधारा और कर्म सर्वोपरि हैं।
नीतीश कुमार का मानना है कि राजनीति सेवा का माध्यम है, विरासत में मिली जागीर नहीं। उन्होंने कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से परिवारवाद पर हमला बोला है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है और नेता का चुनाव योग्यता के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी परिवार विशेष में जन्म लेने के कारण। यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब उनके कई समकालीन नेता अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हैं।
हालांकि, समय-समय पर जनता दल (यूनाइटेड) के कार्यकर्ताओं की ओर से निशांत कुमार को राजनीति में लाने की मांग उठती रही है।पटना में JDU कार्यालय के बाहर उनके समर्थन में पोस्टर भी देखे गए हैं, जिनमें उन्हें बिहार का भविष्य बताया गया है यहां तक कि कुछ विपक्षी नेताओं ने भी निशांत को मुख्यमंत्री बनाने जैसे बयान दिए हैं। इन सबके बावजूद नीतीश कुमार अपने सिद्धांतों पर अडिग हैं।
निशांत कुमार, जो पेशे से इंजीनियर हैं, खुद भी सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे हैं। वह सार्वजनिक जीवन में कम ही नजर आते हैं और अपने पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उनकी कोई पहचान नहीं है। नीतीश कुमार ने हमेशा यही संदेश दिया है कि उनके लिए पूरा बिहार ही उनका परिवार है और वे किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे राज्य के विकास के लिए काम करते हैं।[1]
नीतीश का यह कदम समाजवादी परंपरा के उन महान नेताओं की याद दिलाता है जिन्होंने परिवार से ज्यादा पार्टी और विचारधारा को महत्व दिया। ऐसे समय में जब भारतीय राजनीति में परिवारवाद की जड़ें गहरी होती जा रही हैं, नीतीश कुमार का यह फैसला एक मिसाल कायम करता है और यह बहस छेड़ता है कि क्या एक राजनेता के बेटे या बेटी होने से ही राजनीति में आने का स्वाभाविक अधिकार मिल जाता है।






