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बंगाल का चुनावी दंगल, प्रतीकों की राजनीति में गुम हुए जनता के असली मुद्दे…

Bengal's election battle, people's real issues lost in the politics of symbols

Breaking Today, Digital Desk : पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल में अक्सर यह देखा गया है कि जनता की बुनियादी ज़रूरतों और विकास के असली मुद्दे, प्रतीकों और पहचान की राजनीति के शोर में कहीं दब कर रह जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे जीवन के महत्वपूर्ण पहलू, जो किसी भी प्रगतिशील समाज की नींव होते हैं, चुनावी बहसों से लगभग गायब दिखते हैं।

इनकी जगह धार्मिक नारों, सांस्कृतिक प्रतीकों और भावनात्मक अपीलों ने ले ली है। राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीतियों के तहत इन प्रतीकों का इस्तेमाल वोटरों को अपनी ओर खींचने के लिए करते हैं। इस प्रक्रिया में, वे आम आदमी के उन सवालों को पीछे छोड़ देते हैं जो उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जैसी प्रमुख पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रतीकात्मक नीतियों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे ध्रुवीकरण बढ़ता है।

यह एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जहाँ चुनाव जीतना, जनता के वास्तविक कल्याण से ज़्यादा महत्वपूर्ण लगने लगता है, और प्रतीकवाद की यह दौड़ विकास के एजेंडे पर भारी पड़ती है। राजनीतिक दलों द्वारा हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच सामाजिक विभाजन का फायदा उठाने की कोशिशों से यह और भी जटिल हो जाता है। पार्टियाँ एक-दूसरे पर मुस्लिम तुष्टीकरण या बहुसंख्यकवाद का आरोप लगाती हैं, जिससे वास्तविक शासन के मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। परिणामस्वरूप, चुनावी विमर्श शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण विषयों से हटकर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के टकराव पर केंद्रित हो जाता है

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