
Breaking Today, Digital Desk : बिहार की राजनीति में आजकल महागठबंधन की खूब चर्चा हो रही है. इस गठबंधन में कई बड़े और पुराने दल शामिल हैं, लेकिन इसे एकजुट रखने में एक ऐसे नेता की अहम भूमिका है, जिनकी चर्चा अक्सर कम होती है – सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के महासचिव, दिपंकर भट्टाचार्य.
आप सोच रहे होंगे कि इतनी बड़ी पार्टियों के बीच उनकी क्या भूमिका हो सकती है? दरअसल, दिपंकर भट्टाचार्य वह ‘गोंद’ हैं जो महागठबंधन को जोड़कर रखे हुए हैं. उनकी पार्टी भले ही संख्या में छोटी दिखती हो, लेकिन बिहार की ज़मीनी राजनीति में उनकी गहरी पैठ है, खासकर दलितों, मज़दूरों और किसानों के बीच.
जब भी गठबंधन में कोई छोटा-मोटा मनमुटाव होता है या सीटों के बँटवारे पर बात अटकती है, तो दिपंकर भट्टाचार्य एक शांत और सुलझे हुए मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं. वह अपनी विचारधारा पर अडिग रहते हुए भी दूसरे दलों की बात धैर्य से सुनते हैं और एक सहमति बनाने की कोशिश करते हैं. उनका अनुभव और सादगी सभी दलों को उन पर भरोसा करने पर मजबूर करती है.
बिहार में उनकी पार्टी ने हमेशा उन मुद्दों को उठाया है जो सीधे आम लोगों से जुड़े हैं – चाहे वह शिक्षा का अधिकार हो, स्वास्थ्य सेवाएँ हों या रोज़गार का मुद्दा. यही वजह है कि उनकी बात का वज़न महागठबंधन के भीतर भी काफी होता है. वह सिर्फ सीटों की संख्या के आधार पर अपनी बात नहीं रखते, बल्कि मुद्दों और सिद्धांतों के आधार पर अपनी राय देते हैं.
महागठबंधन के नेताओं को भी यह बात पता है कि अगर उन्हें ज़मीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत रखनी है, तो दिपंकर भट्टाचार्य जैसे नेताओं का साथ ज़रूरी है. उनकी मौजूदगी से गठबंधन को एक सामाजिक आधार मिलता है जो सिर्फ बड़े नेताओं के नाम से नहीं आता.
आने वाले चुनावों में महागठबंधन की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी एकजुटता से लड़ते हैं. और इस एकजुटता को बनाए रखने में दिपंकर भट्टाचार्य जैसे नेताओं की भूमिका सच में अनमोल है. वह पर्दे के पीछे रहकर भी एक बड़े बदलाव की नींव रख रहे हैं.






