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मंदिर में दर्शन के बाद सीढ़ियों पर क्यों बैठना चाहिए…

Why should one sit on the stairs after visiting a temple, Know the spiritual and scientific secret behind this

Breaking Today, Digital Desk : सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि मंदिर में भगवान के दर्शन करने के बाद कुछ देर के लिए उसकी सीढ़ियों पर या परिसर में बैठना चाहिए। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं या फिर वहां बैठकर सांसारिक बातें करने लगते हैं। लेकिन, हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई यह परंपरा केवल एक रिवाज नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं। आइए, जानते हैं कि आखिर क्यों मंदिर में दर्शन के बाद थोड़ी देर बैठना महत्वपूर्ण है।

आध्यात्मिक महत्व: ईश्वर की ऊर्जा को आत्मसात करना

जब हम मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो वहां मंत्रोच्चार, घंटियों की ध्वनि और आरती से एक सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। भगवान की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा द्वारा एक विशेष ऊर्जा स्थापित की जाती है। दर्शन के बाद तुरंत मंदिर से बाहर आ जाने से यह सकारात्मक ऊर्जा हमारे भीतर पूरी तरह से समाहित नहीं हो पाती है। कुछ देर शांति से बैठने से हमारा मन शांत होता है और हम उस दिव्य ऊर्जा को अपने अंदर महसूस कर पाते हैं। यह समय भगवान के स्वरूप का ध्यान करने और दर्शन के अनुभव को अपने मन में बसाने का होता है।

शास्त्रों में इस परंपरा के पीछे एक विशेष श्लोक का भी उल्लेख मिलता है, जिसे बैठकर मन ही मन जपना चाहिए। यह श्लोक सांसारिक वस्तुओं की मांग करने के बजाय जीवन के सार के लिए एक प्रार्थना है:

अनायासेन मरणम्,
विना देन्येन जीवनम्।
देहान्ते तव सानिध्यम्,
देहि मे परमेश्वरम्॥

इसका अर्थ है:

अनायासेन मरणम्: हे प्रभु, हमें बिना किसी कष्ट के सहज मृत्यु प्राप्त हो।

विना देन्येन जीवनम्: हमें ऐसा जीवन मिले जिसमें हम किसी पर निर्भर न रहें और लाचारी का जीवन न जीना पड़े।

देहान्ते तव सानिध्यम्: जब भी हमारी मृत्यु हो, वह आपके सानिध्य में हो, जैसे भीष्म पितामह को मृत्यु के समय श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे।

देहि मे परमेश्वरम्: हे परमेश्वर, हमें ऐसा ही वरदान दीजिए।

यह प्रार्थना भौतिक चीजों की याचना नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ और आध्यात्मिक निवेदन है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति

विज्ञान भी इस परंपरा का समर्थन करता है। मंदिरों का निर्माण अक्सर ऐसी जगहों पर किया जाता है जहां पृथ्वी की चुंबकीय तरंगें अधिक सक्रिय होती हैं। मंदिर के गर्भगृह में, जहां मूर्ति स्थापित होती है, यह ऊर्जा सबसे अधिक केंद्रित होती है। दर्शन के बाद कुछ देर बैठने से शरीर इस सकारात्मक और चुंबकीय ऊर्जा को अवशोषित करता है।

इसके अलावा, मंदिर का शांत वातावरण, घंटियों की ध्वनि और मंत्रों का जाप हमारे मस्तिष्क की तरंगों पर प्रभाव डालते हैं, जिससे मन की चंचलता कम होती है और मानसिक शांति मिलती है। कुछ देर बैठने से हमारा तंत्रिका तंत्र स्थिर होता है, तनाव कम होता है और हमें एक नई ऊर्जा का अनुभव होता है। यह एक तरह से आध्यात्मिक रिचार्जिंग स्टेशन की तरह काम करता है, जहां हमारा मन और शरीर सकारात्मकता से भर जाता है।

इसलिए, अगली बार जब आप मंदिर जाएं, तो दर्शन के बाद कुछ पल शांति से वहां अवश्य बैठें। यह छोटा सा ठहराव आपको न केवल आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करेगा, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करेगा।

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