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37 साल पुराने कानून पर महाराष्ट्र में छिड़ा राजनीतिक घमासान…

Political turmoil erupts in Maharashtra over 37 year old law

Breaking Today, Digital Desk : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महाराष्ट्र के कई शहरों में मांस की दुकानों और बूचड़खानों को बंद रखने के आदेश ने एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। जहां विपक्षी दलों ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है, वहीं राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया है कि यह कोई नया फरमान नहीं है, बल्कि 1988 से लागू एक सरकारी प्रस्ताव (जीआर) का हिस्सा है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (केडीएमसी) ने 15 अगस्त को मांस की बिक्री पर प्रतिबंध का आदेश जारी किया। इसके तुरंत बाद छत्रपति संभाजीनगर, मालेगांव, नागपुर और अमरावती जैसे अन्य नगर निकायों ने भी इसी तरह के निर्देश जारी किए। इन आदेशों के अनुसार, 14 अगस्त की मध्यरात्रि से 15 अगस्त की मध्यरात्रि तक 24 घंटे के लिए सभी बूचड़खाने और लाइसेंस प्राप्त मांस की दुकानें बंद रखने को कहा गया।

पुराना कानून, नया विवाद

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि राज्य सरकार ने ऐसा कोई नया निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने बताया कि यह फैसला 37 साल पुराने एक सरकारी प्रस्ताव के आधार पर नगर निगमों द्वारा हर साल लागू किया जाता है। फडणवीस ने यह भी कहा कि उन्हें स्वयं इस पुराने जीआर के बारे में मीडिया के माध्यम से ही पता चला। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार की लोगों के खाने-पीने की आदतों को नियंत्रित करने में कोई दिलचस्पी नहीं है और उनके सामने और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। भाजपा ने इस मामले में विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि 1988 में जब यह नीति लागू की गई थी, तब शरद पवार मुख्यमंत्री थे।

विपक्ष और सहयोगी दलों के अलग-अलग सुर

इस प्रतिबंध का विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता आदित्य ठाकरे ने नगर निगमों की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें सड़कों के गड्ढों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन बताते हुए कहा, “स्वतंत्रता दिवस पर हम क्या खाते हैं, यह हमारा अधिकार है।”

दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आए हैं। उपमुख्यमंत्री और राकांपा नेता अजित पवार ने इस तरह के प्रतिबंध को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि प्रमुख शहरों में विभिन्न जातियों और धर्मों के लोग रहते हैं और महाराष्ट्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर इस तरह के आदेश लागू करना मुश्किल है।

वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक और गलत करार देते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस का मांस खाने से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने इसे लोगों की आजादी, निजता और आजीविका के अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

जमीनी हकीकत और प्रतिक्रियाएं

कई नगर निगमों का कहना है कि यह प्रतिबंध केवल स्वतंत्रता दिवस पर ही नहीं, बल्कि गांधी जयंती, महावीर जयंती और गणेश चतुर्थी जैसे अन्य अवसरों पर भी लागू होता है। इस बीच, कुछ राजनीतिक दलों और कसाई संघों ने इस प्रतिबंध के खिलाफ प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है, जिसके चलते कल्याण जैसे इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि फडणवीस सरकार गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के “बेतुके” विवाद पैदा कर रही है।

यह पूरा प्रकरण महाराष्ट्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सरकारी नियमों और राजनीतिक खींचतान के बीच एक जटिल बहस को उजागर करता है, जहां एक पुराना कानून आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में नए सिरे से सवालों के घेरे में है।

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