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कोटा के भीतर कोटा, क्या कर्नाटक में कांग्रेस का ‘आंतरिक आरक्षण’ दांव बीजेपी को देगा मात…

Quota within quota, will Congress's 'internal reservation' bet in Karnataka defeat BJP

Breaking Today, Digital Desk : कर्नाटक की राजनीति में एक बड़े बदलाव के तहत, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अनुसूचित जातियों (SC) के लिए 17% आरक्षण के भीतर ‘आंतरिक आरक्षण’ को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस फैसले ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है, जिसके केंद्र में दशकों पुराना ‘लेफ्ट’ और ‘राइट’ का समीकरण है। कांग्रेस इस कदम के जरिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ एक मजबूत सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है, ताकि राजनीतिक बढ़त हासिल की जा सके।

क्या है ‘लेफ्ट-राइट’ का पूरा मामला?

कर्नाटक में 101 जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है। इन समुदायों को मोटे तौर पर दो मुख्य समूहों में बांटा जाता है: ‘एससी लेफ्ट’ (वामपंथी), जिसमें मुख्य रूप से मादिगा समुदाय शामिल है, और ‘एससी राइट’ (दक्षिणपंथी), जिसमें मुख्य रूप से होलेया समुदाय आता है। इन दोनों के अलावा, ‘स्पृश्य’ मानी जाने वाली जातियां जैसे बंजारा (लंबाणी), भोवी और अन्य भी हैं।

‘लेफ्ट’ समूह का लंबे समय से आरोप रहा है कि आरक्षण का अधिकांश लाभ ‘राइट’ समूह और अन्य प्रभावशाली जातियां उठा रही हैं, जबकि वे विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए न्यायमूर्ति ए.जे. सदाशिव आयोग और हाल ही में न्यायमूर्ति एच.एन. नागमोहन दास आयोग ने आंतरिक आरक्षण की सिफारिश की थी।

सिद्धारमैया का राजनीतिक दांव

कांग्रेस ने 2023 के विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में सदाशिव आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा किया था। अब, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने नागमोहन दास आयोग की सिफारिशों के आधार पर एक संशोधित फॉर्मूला लागू करने का फैसला किया है। इसके तहत, 17% एससी कोटे को तीन भागों में बांटा गया है: एससी (लेफ्ट) और एससी (राइट) समूहों को 6-6% आरक्षण मिलेगा, जबकि स्पृश्य और अन्य अति पिछड़ी जातियों के लिए 5% कोटा निर्धारित किया गया है।

यह कदम सिद्धारमैया की ‘अहिंदा’ (अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित) राजनीति का ही एक विस्तार माना जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य ‘लेफ्ट’ समूह, खासकर मादिगा समुदाय को अपने पाले में लाना है, जो आबादी के लिहाज से एक बड़ा वोट बैंक है और माना जाता है कि उसका झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ रहा था। इस फैसले को लागू करके, कांग्रेस खुद को सामाजिक न्याय के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में पेश करना चाहती है।

क्या बीजेपी पर मिलेगी ‘ऊपरी हाथ’?

इस फैसले के राजनीतिक नफे-नुकसान दोनों हैं। एक तरफ, कांग्रेस को उम्मीद है कि मादिगा और अन्य अति पिछड़े दलित समुदायों का समर्थन मिलने से उसे आगामी चुनावों में फायदा होगा। वहीं, दूसरी ओर, इस कदम से ‘राइट’ समूह और लंबाणी जैसे समुदाय नाराज हो सकते हैं। कांग्रेस के अपने ही बड़े नेता, जैसे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और गृह मंत्री जी. परमेश्वर, ‘राइट’ समुदाय से आते हैं, जिससे पार्टी के भीतर भी मतभेद की आशंका है।

बीजेपी इस मुद्दे पर सतर्क रुख अपना रही है। पिछली बीजेपी सरकार ने भी आंतरिक आरक्षण पर एक फॉर्मूला पेश किया था, लेकिन वह इसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाई थी। अब बीजेपी कांग्रेस पर समाज को बांटने और वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगा रही है।

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कांग्रेस का यह ‘लेफ्ट-राइट’ कोटा गठबंधन उसे बीजेपी पर वास्तव में ‘ऊपरी हाथ’ दिलाता है या फिर यह कदम पार्टी के लिए ही एक नई चुनौती बन जाता है।

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